धर्म

इसलिए एकादशी में चावल खाने से किया जाता है मना, आध्यात्म और विज्ञान दोनों ने ही की इस ढंग से पुष्टि

नई दिल्ली। हिंदू धर्म के अनुयायी अपने धर्मानुसार कई तरह के नियमों का पालन करते हैं। इनमें कई तरह की पूजा, व्रत इत्यादि शामिल हैं। इन्हीं में से एक है एकादशी का व्रत। इसका हिंदुओं में बड़ा महत्व है। साल में कुल 24 एकादशी होती है। जिस वर्ष मलमास लगता है उस वर्ष इसकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है।

भगवान विष्णु के अत्यन्त प्रिय व्रत एकादशी के दिन लोग उपवास रखकर उनके विभिन्न अवतारों का ध्यान करते हुए उनकी पूजा करते हैं। एकादशी व्रत के कुछ महत्वपूर्ण नियम हैं जिनका पालन करना आवश्यक है। इस दिन सात्विकता का पालन करना चाहिए।

मतलब इस दिन लहसुन, प्याज, मांस, मछली,अंडा नहीं खाना चाहिए और इसके साथ ही एकादशी में चावल से भी परहेज करना चाहिए। अब सवाल यह आता है कि एकादशी में चावल का सेवन करने से क्यों मना किया जाता है? आखिर इसके पीछे की वजह क्या है?

 

भगवान विष्णु

पौराणिक कथाओं में इसका जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि,माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने अपने शरीर का त्याग दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया। महर्षि मेधा चावल और जौ के रूप में धरती पर उत्पन्न हुए। इसी वजह से चावल और जौ को जीव के तौर पर देखा जाता है।

महर्षि मेधा का अंश जिस दिन पृथ्वी में समाया, उस दिन एकादशी तिथि थी। चूंकि चावल और जौ को जीव माना जाता है इसीलिए इस दिन चावल के सेवन को वर्जित माना गया है। मान्यता है कि, एकादशी के दिन चावल खाना महर्षि मेधा के मांस और रक्त का सेवन करने जैसा है।

यह तो रही आध्यात्मिक दृष्टिकोण की बात। अब जरा देखते हैं कि विज्ञान का इस बारे में क्या कहना है?

 

worship

वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार, चावल में पानी की मात्रा सबसे ज्यादा होती है। इसके सेवन से शरीर में जल की मात्रा बढ़ जाती है जिसके चलते मन चंचल और विचलित हो जाता है। मन के चंचल हो जाने से व्रत के नियमों पर ध्यानकेन्द्रित करने और उनका पालन करने में बाधा आती है। इन्हीं सब कारणों के चलते एकादशी के दिन चावल खाने से मना किया गया है।

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